उसे उम्मीद नहीं थी कि एक दिन फिर अपना घर देखेगी। वो दहलीज़, जो कभी पोते की किलकारियों से गूंजती थी, अब तन्हा और चुप हो चुकी थी। बेटे ने गिफ्ट डीड के नाम पर सब छीन लिया था—छत, इज्ज़त और हक़… लेकिन कहते हैं न, न्याय अगर वक्त पर मिल जाए तो भगवान कहीं दूर नहीं होता—और इस बार भगवान की शक्ल में सामने आए जिलाधिकारी सविन बंसल।

त्यूणी, 19 जुलाई 2025
तीन दिन, एक फैसला, और एक टूटी उम्मीद की वापसी…
3080 वर्ग फीट का वह मकान जो बुजुर्ग सरदार परमजीत सिंह और उनकी पत्नी अमरजीत कौर ने अपने बेटे गुरविंदर सिंह को गिफ्ट डीड में दिया था, वही बेटा जब उन्हें उसी घर से बेदखल करने लगा तो उनकी पूरी दुनिया उजड़ गई। पोते-पोतियों से मिलने पर भी रोक लगा दी गई। बुजुर्ग दंपति दर-दर भटके—कभी तहसील, कभी थाने, कभी छोटे अदालतों के चक्कर काटे—पर हर जगह सिर्फ तारीखें मिलीं, इंसाफ नहीं।
लेकिन जब पहुंचा मामला डीएम न्यायालय, तो पहली ही सुनवाई में चला ‘इंसाफ का हथौड़ा’।
जिलाधिकारी सविन बंसल ने भरणपोषण अधिनियम की विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए मात्र तीन दिन में आदेश पारित कर दिया—गिफ्ट डीड रद्द, बेटा अब मालिक नहीं, सम्पत्ति दोबारा मां-बाप के नाम। रजिस्ट्री कार्यालय को आदेश का त्वरित अनुपालन करने के निर्देश दिए गए, और पूरा मामला तीन दिन में ही निष्पादित हो गया। गिफ्ट डीड की शर्तें थी स्पष्ट: बेटे को माता-पिता का भरण-पोषण करना होगा। उन्हें साथ रखना होगा।
पोते-पोती को दादा-दादी से मिलने से नहीं रोक सकता।लेकिन जैसे ही बेटे को मालिकाना हक मिला, उसने सारी शर्तों को ताक पर रख दिया। बुजुर्गों को बेदखल कर दिया, मिलने पर पाबंदी लगा दी। इतना ही नहीं, जब नोटिस और सार्वजनिक सूचना के बाद भी बेटे ने कोर्ट में उपस्थिति नहीं दी, तब डीएम ने सख्त रुख अपनाते हुए फैसला सुनाया।
फैसले के वक्त छलके आंसू, थर्राया कक्ष – और इंसाफ ने दस्तक दी
डीएम कोर्ट में जैसे ही आदेश पढ़कर सुनाया गया, बुजुर्ग दंपति की आंखों से आंसू रुक नहीं पाए। वर्षों से दबा दर्द बाहर आया। वहीं उपस्थित लोग भी भावुक हो उठे। यह सिर्फ एक केस नहीं था, यह उस व्यवस्था पर भरोसे की वापसी थी, जिसमें लोग यकीन करना छोड़ चुके थे।
एक जिलाधिकारी, जो सच्चे मायनों में ‘जनसेवक’ बना
डीएम सविन बंसल की इस कार्रवाई ने यह साबित कर दिया कि जब इच्छा हो तो सिस्टम में बैठे अधिकारी भी ‘भगवान’ बन सकते हैं। उन्होंने न सिर्फ नियमों का पालन किया, बल्कि मानवता और संवेदनशीलता को भी प्राथमिकता दी।
एक संदेश पूरे जिले को…
इस फैसले के बाद पूरे जिले में एक नई उम्मीद जगी है—कि अगर किसी के साथ अन्याय हो रहा है, तो वह चुप न बैठे। अगर कहीं से भी इंसाफ नहीं मिल रहा, तो डीएम न्यायालय जैसे दरवाज़े आज भी खुले हैं।
आख़िर में सिर्फ इतना:
“किसी मां-बाप को उसके अपने घर से कोई नहीं निकाल सकता, अगर कानून और संवेदनशील प्रशासन उसके साथ हो।”
और देहरादून में आज ये मुमकिन हुआ, क्योंकि यहां एक जिलाधिकारी हैं—जो सच में ‘न्याय’ को ज़िंदा रखते हैं।
