रुड़की : सेना में अफसर बनने का सपना देखने वाले उत्तराखण्ड के शुभम जुयाल की जिंदगी एक सड़क हादसे ने पूरी तरह बदल दी। जिस दिन वह सर्विस सिलेक्शन बोर्ड (SSB) इंटरव्यू के लिए जा रहे थे, उसी दिन हुए बाइक हादसे में उन्हें अपना एक पैर गंवाना पड़ा। लेकिन उन्होंने हालात के आगे हार मानने के बजाय नई राह चुनी और अब कॉमनवेल्थ पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत के लिए सिल्वर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया है।
सेना का सपना, फिर जिंदगी ने लिया अप्रत्याशित मोड़
रुड़की निवासी शुभम जुयाल बचपन से सेना की वर्दी पहनकर देश की सेवा करना चाहते थे। उनके पिता भारतीय सेना से नायब सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। पिता की तरह सेना में अधिकारी बनने के लक्ष्य के साथ शुभम ने आर्मी की ACC एंट्री के तहत लिखित परीक्षा भी पास कर ली थी और SSB इंटरव्यू के लिए जा रहे थे। इसी दौरान हुए सड़क हादसे ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
दुर्घटना इतनी गंभीर थी कि डॉक्टरों को उनका एक पैर काटना पड़ा। अस्पताल के बिस्तर पर उन्होंने महसूस किया कि जिंदगी अनिश्चित है और भविष्य की चिंता में वर्तमान को खोना सही नहीं। यहीं से उन्होंने नई शुरुआत करने का फैसला किया।
पैरा स्पोर्ट्स को बनाया नई पहचान
2023 में शुभम को पुणे स्थित आर्टिफिशियल लिम्ब सेंटर भेजा गया। वहां उन्हें दो विकल्प दिए गए—डिप्लोमा कोर्स कर नौकरी की दिशा में बढ़ना या पैरा स्पोर्ट्स में करियर बनाना। उन्होंने खेलों को चुना और खुद को साबित करने की ठान ली।
इसी दौरान उनकी मुलाकात दो बार के पैरालंपियन और भारतीय सेना के सूबेदार सोमन राणा से हुई। उनके मार्गदर्शन और प्रशिक्षण ने शुभम का आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक जीतने का लक्ष्य तय किया।
ग्लासगो में देश को दिलाया सिल्वर
ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप के पुरुष शॉटपुट एफ-57 वर्ग में शुभम जुयाल ने 13.28 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो करते हुए रजत पदक अपने नाम किया। खास बात यह रही कि इसी स्पर्धा में भारत के सोमन राणा ने 13.40 मीटर का थ्रो कर स्वर्ण पदक जीता।
इस तरह भारत ने इस इवेंट में गोल्ड और सिल्वर दोनों पदक अपने नाम किए। शुभम ने पूरे मुकाबले में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया और अंतिम प्रयास में अपना सर्वश्रेष्ठ थ्रो कर सिल्वर पदक सुनिश्चित किया।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
एक हादसे ने शुभम का सेना में अफसर बनने का सपना जरूर छीन लिया, लेकिन उनके हौसले को नहीं तोड़ सका। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों को अपनी ताकत बनाया और अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के लिए पदक जीतकर यह साबित कर दिया कि मजबूत इरादों के सामने मुश्किलें ज्यादा देर तक टिक नहीं पातीं।
