“नदी में बहती गेंदों से लेकर बच्चों की आंखों में बहते आंसू तक… सविन बंसल ने सब बदल दिया”
“धाकड़ सीएम के धाकड़ डीएम – बच्चों के दिल में एक नया नाम”
“उम्मीदों का मैदान”गोविंद शर्मा (त्यूणी )7807238177

एक स्कूल, कुछ टूटे सपने… और एक जिलाधिकारी जिसने उन्हें फिर से जोड़ा
त्यूणी इंटर कॉलेज के छात्रों की कहानी = “हमें लगा था कि स्कूल की पढ़ाई खत्म हो जाएगी, पर मैदान कभी नहीं बनेगा… लेकिन डीएम साहब ने चमत्कार कर दिया।” कक्षा 11 की छात्रा, आंखों में चमक लिए हुए
चकराता विधानसभा के एक सरकारी इंटर कॉलेज में, जहां वर्षों से खेलकूद का नाम तक नहीं लिया जाता था, अब चहलकदमी है, उल्लास है, और सबसे बढ़कर – उम्मीद है। 45 सालों से इस विद्यालय के छात्र एक अच्छे खेल मैदान का सपना देख रहे थे, जो अब जाकर देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल के निर्देश पर साकार होता दिख रहा है।
जब उम्मीद भी हार मान चुकी थी
नदी के किनारे बने इस सरकारी त्यूणी इंटर कॉलेज में वॉलीबॉल खेलने के लिए कोई सुरक्षित मैदान नहीं था।
बच्चे जैसे-तैसे नदी किनारे खेलते, लेकिन कई बार गेंद पानी में बह जाती, और खेल वहीं खत्म हो जाता।
समस्या वर्षों पुरानी थी, लेकिन समाधान कहीं नहीं।
विद्यालय प्रशासन, शिक्षक, छात्र और अभिभावक – सभी ने अनेकों बार जिला प्रशासन को लिखित ज्ञापन सौंपे, परंतु कभी सुनवाई नहीं हुई।
“अब तो हमें उम्मीद छोड़नी आ गई थी,” – यह कहते हुए स्कूल के एक शिक्षक की आंखें नम हो जाती हैं।
फिर एक नाम सामने आया – सविन बंसल

नव नियुक्त जिलाधिकारी सविन बंसल के बारे में सुनकर कुछ छात्रों ने हिम्मत जुटाई और उन्हें व्हाट्सएप के माध्यम से एक पत्र भेजा।
पत्र छोटा था, लेकिन दर्द और उम्मीद से भरा था –
“सर, क्या हमारे स्कूल में कभी मैदान बन पाएगा?”
और फिर वही हुआ, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
सिर्फ 24 घंटे में आदेश, ₹4.82 लाख की स्वीकृति
डीएम सविन बंसल ने ना केवल छात्रों की गुहार सुनी, बल्कि सिर्फ एक दिन के भीतर 4 लाख 82 हजार रुपये की धनराशि मैदान निर्माण के लिए स्वीकृत कर दी।
इतना त्वरित निर्णय सुनकर पहले स्कूल के स्टाफ और बच्चों को विश्वास नहीं हुआ।
“सोचा फिर कोई झूठा वादा होगा… लेकिन जब ट्रैक्टर आया और काम शुरू हुआ, तो हम रो पड़े,” – कक्षा 12 के छात्र की बात पर पूरा स्टाफ भावुक हो उठा।
बच्चों ने कहा – ये डीएम नहीं, हमारे सपनों का नायक है
ग्राउंड का काम अब तेजी से जारी है। स्कूल का यह मैदान अब चकराता ब्लॉक का सबसे सुंदर और सुरक्षित खेल मैदान बनता जा रहा है।
छात्रों ने खुशी जाहिर करते हुए कहा –
“हम जब दूसरे स्कूलों में जाते थे, तो शर्मिंदगी होती थी… अब जब हमारे पास मैदान होगा, तो हम भी गर्व से दूसरों को आमंत्रित करेंगे।”
एक छात्रा ने वॉलीबॉल पर मार्कर से लिखा – “DM Sir – Our Hero

“वो मैदान जो कभी था ही नहीं “
नदी के किनारे एक पथरीला सा टुकड़ा, जो कभी वॉलीबॉल का ग्राउंड कहलाता था। गेंद कई बार नदी में बह जाती, और बच्चों के चेहरों पर वह मायूसी आ जाती जो अब उनकी पहचान बन चुकी थी।
“हमें तो लगने लगा था कि शायद हम कभी मैदान में दौड़ने के लिए बने ही नहीं,”
कक्षा 11 की छात्रा ने धीमे स्वर में कहा।
बच्चों ने खेल प्रतियोगिताओं में जाना छोड़ दिया था, शिक्षक अभिभावकों को समझाने लगे थे कि “क्या करें, सुविधा नहीं है।”
समस्या सबको दिखती थी, पर समाधान कहीं नहीं था। स्कूल प्रशासन ने कई बार अधिकारियों को पत्र लिखे, पंचायत में बात उठाई, पर हर बार एक नया आश्वासन और वही पुराना परिणाम – कुछ नहीं।
“फिर आई एक फुसफुसाहट – एक नया डीएम आया है…”
फिर एक दिन चकराता की गलियों में एक फुसफुसाहट सुनाई दी –
“नए जिलाधिकारी साहब कुछ अलग हैं… काम करते हैं… सुनते हैं।”
बच्चों ने पहले तो मज़ाक समझा।
“अरे! कौन सा डीएम कभी खेल मैदान बनवाता है?”
लेकिन उम्मीद के बीज वहीं कहीं अंकुरित हो गए थे।
कक्षा 12 के एक छात्र ने दोस्तों से कहा,
“व्हाट्सएप नंबर है उनका… क्यों न एक कोशिश और कर लें?”
और फिर, हिचकिचाते हुए, डरते हुए, शायद आखिरी उम्मीद समझकर, बच्चों ने डीएम सविन बंसल को एक छोटा सा पत्र व्हाट्सएप पर भेजा – “सर, हम वॉलीबॉल खेलना चाहते हैं… लेकिन हमारे पास मैदान नहीं है।”
“जिस उत्तर की उम्मीद नहीं थी, वही सबसे बड़ा उत्तर बन गया”
उन्हें नहीं पता था कि इस बार जिनके पास उनकी गुहार पहुँची है, वो सिर्फ कुर्सी पर बैठने वाला अफसर नहीं, बल्कि दिल से सुनने वाला इंसान है।
मात्र 24 घंटे के भीतर, जिलाधिकारी सविन बंसल ने 4,83,000 रुपये की राशि स्वीकृत कर दी – मैदान निर्माण के लिए। ना कोई फाइलों का ढेर, ना कोई दौड़भाग… बस एक फैसला – बच्चों की उम्मीद को ज़मीन देने का।
“भावुकता में डूबी आंखें, झूमता हुआ दिल”
स्कूल का पूरा माहौल बदल चुका था।
बच्चों की आँखों में आंसू थे, पर यह आंसू हार के नहीं, उम्मीद की वापसी के थे।
एक छात्रा मैदान के किनारे खड़े होकर बोली –
“हमें कभी लगा ही नहीं था कि कोई हमें सुन भी सकता है… जिलाधिकारी साहब जैसे फरिश्ते ही होते हैं।” बच्चे वॉलीबॉल लेकर मैदान में भागते थे, बार-बार गिरते, उठते, फिर हँसते।

उनका खेल अब सिर्फ खेल नहीं था, यह उनकी गरिमा की वापसी थी।
“शिक्षकों को भी मिला उनका साथी”
विद्यालय के शिक्षक भी उस रोशनी से भर उठे थे, जिसका उन्हें वर्षों से इंतज़ार था।
प्रधानाचार्य बोले –
“हमने कभी नहीं सोचा था कि कोई अफसर सिर्फ एक पत्र पढ़कर निर्णय ले लेगा। पहले तो हमें 10 पत्र भेजने पड़ते थे और फिर भी उत्तर नहीं मिलता था… अब एक पत्र भी काफी है।”
एक वरिष्ठ अध्यापक भावुक होकर बोले – “डीएम साहब ने ना सिर्फ बच्चों को मैदान दिया है, बल्कि हम शिक्षकों को भरोसा दिया है कि अब हमारी आवाज़ अनसुनी नहीं जाएगी।”
“अब यह मैदान सिर्फ मिट्टी का टुकड़ा नहीं है”
स्कूल की दीवारों पर अब एक नया नारा लिखा गया है –
“जहाँ उम्मीद हो, वहाँ मैदान भी बनते हैं।”
“धाकड़ डीएम – बच्चों के दिल में एक नाम”
अब छात्र उन्हें ‘धाकड़ डीएम’ कहते हैं।
