- नई स्टडी में खुलासा, हिमालय के नीचे सक्रिय भ्रंश 115 किलोमीटर तक लॉक; शोधकर्ताओं के मुताबिक करीब 100 साल में मैग्नीट्यूड 8.1 के भूकंप जितनी ऊर्जा जमा हो सकती है
देहरादून। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में बड़े भूकंप की आशंका को लेकर एक नए अध्ययन ने चिंता बढ़ाई है। शोध के अनुसार, भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों के टकराव से बना हिमालय के नीचे स्थित मुख्य भ्रंश यानी मेन हिमालयन थ्रस्ट (एमएचटी) काफी हद तक लॉक है। इसके कारण धरती के भीतर टेक्टोनिक तनाव लगातार जमा हो रहा है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि करीब हर 100 साल में जमा होने वाला तनाव मैग्नीट्यूड 8.1 के भूकंप से निकलने वाली ऊर्जा के बराबर हो सकता है।
‘एविडेंस ऑफ स्ट्रॉन्ग प्लेट कपलिंग इन द उत्तराखंड हिमालयाज’ शीर्षक से किया गया यह अध्ययन तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं दिब्यशक्ति पांडा, मृदुल यादव, एरिक ओ. लिंडसे और जी. श्रीनिवास राव ने किया है। इसके निष्कर्ष यूरोपीय भूविज्ञान संघ की बैठक से संबंधित शोध सामग्री में प्रकाशित किए गए हैं।
115 किलोमीटर तक लॉक है भ्रंश
शोधकर्ताओं ने ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) स्टेशनों से मिले आंकड़ों और जापान के एएलओएस-2 उपग्रह की रडार तस्वीरों का विश्लेषण किया। अध्ययन में भ्रंश पर प्रति वर्ष लगभग 18 मिलीमीटर का स्लिप डेफिसिट पाया गया। इसका अर्थ है कि भारतीय प्लेट की गति का एक बड़ा हिस्सा भ्रंश पर लगातार खिसकने के बजाय तनाव के रूप में जमा हो रहा है।
शोध के अनुसार, मेन हिमालयन थ्रस्ट करीब 115 किलोमीटर की चौड़ाई तक लॉक है। भारतीय प्लेट लगातार यूरेशियाई प्लेट की ओर बढ़ रही है, लेकिन भ्रंश के लॉक होने के कारण आसपास की चट्टानों में खिंचाव और दबाव बढ़ रहा है। लंबे समय तक जमा हुआ यह तनाव बड़े भूकंप के दौरान अचानक मुक्त हो सकता है।
उपग्रहों से जमीन के ऊपर उठने के संकेत
अध्ययन में जमीन की ऊर्ध्वाधर गति भी दर्ज की गई। एएलओएस-2 उपग्रह के इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार (इनसार) आंकड़ों के मुताबिक, कुछ क्षेत्रों में जमीन के ऊपर उठने की दर 4 से 6 मिलीमीटर प्रतिवर्ष तक पाई गई। शोधकर्ताओं ने क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर बदलावों को समझने के लिए एक इलास्टिक सबडक्टिंग प्लेट मॉडल का इस्तेमाल किया, जो देखे गए बदलावों के अनुरूप पाया गया।
मध्य हिमालय का क्षेत्र वैज्ञानिकों की निगरानी में
उत्तराखंड मध्य हिमालय के उस क्षेत्र का हिस्सा है, जिसे वैज्ञानिक भूकंपीय अंतराल यानी ‘सिस्मिक गैप’ के रूप में देखते हैं। इस क्षेत्र के कुछ हिस्सों में लंबे समय से बड़े भूकंप नहीं आए हैं, जिस कारण यहां जमा टेक्टोनिक तनाव को लेकर अध्ययन जारी हैं। इस क्षेत्र के निकट स्थित गंगा के मैदानी इलाकों में भी बड़ी आबादी रहती है।
हालांकि, शोध में हर 100 साल में मैग्नीट्यूड 8.1 के भूकंप के बराबर ऊर्जा जमा होने का अनुमान किसी निश्चित समय पर भूकंप आने की भविष्यवाणी नहीं है। अध्ययन यह नहीं बताता कि अगला बड़ा भूकंप कब आएगा। इसके निष्कर्ष हिमालयी भ्रंश की स्थिति और दीर्घकालिक भूकंप जोखिम को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

